The journey from the soul to the Supreme Being?

परमात्मा क्या है और परमात्मा को कैसे पाएँ

परमात्मा शब्द का अर्थ है – परम + आत्मा यानी सर्वोच्च आत्मा, जो इस समस्त सृष्टि का सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है। वह अदृश्य होते हुए भी हर जगह विद्यमान है। संसार में जितनी भी चेतना, शक्ति और जीवन है, सब उसी परमात्मा से उत्पन्न होते हैं। वह न जन्म लेता है, न मरता है, न घटता है, न बढ़ता है। वह एक अनंत शक्ति है जो हर जीव के भीतर निवास करती है। यही कारण है कि कहा गया है – “ईश्वर सर्वत्र है।” परमात्मा किसी मूर्ति या स्थान में सीमित नहीं है, बल्कि वह हर दिशा, हर हृदय और हर कण में मौजूद है। वेदों और उपनिषदों में परमात्मा को सत्, चित् और आनंद स्वरूप बताया गया है — अर्थात् वह सत्य है, चेतन है और आनंद का मूल स्रोत है। जब हम अपने अंदर झाँकते हैं और मन को शांत करते हैं, तब हमें उस परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होता है। परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग बाहरी नहीं, आंतरिक है। उसे पाने के लिए किसी यात्रा की नहीं बल्कि आत्म-चिंतन, भक्ति और सच्चे कर्म की आवश्यकता होती है। जब मन शुद्ध होता है, अहंकार मिटता है और जीवन में प्रेम का प्रवाह आता है, तभी परमात्मा की झलक मिलने लगती है।
परमात्मा को पाने के मार्ग:

सच्ची भक्ति: बिना दिखावे की, हृदय से की गई भक्ति परमात्मा तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है। नामस्मरण, भजन, प्रार्थना और सेवा से मन निर्मल होता है और आत्मा जाग्रत होती है।
ध्यान और योग: ध्यान में बैठकर जब हम अपने विचारों को शांत करते हैं, तब भीतर की चेतना प्रकट होती है। यही चेतना परमात्मा का अनुभव कराती है। योग शरीर और मन दोनों को संतुलित करता है, जिससे आत्म-साक्षात्कार संभव होता है।
सत्संग और ज्ञान: महापुरुषों की संगति और सत्यज्ञान का अध्ययन व्यक्ति के भीतर ईश्वरीय प्रकाश लाता है। जब अज्ञान का अंधकार मिटता है, तब परमात्मा का बोध होता है।
सद्कर्म और सेवा: जब हम दूसरों की भलाई में आनंद अनुभव करते हैं, तब हम ईश्वर के निकट पहुँचते हैं, क्योंकि परमात्मा दया, प्रेम और करुणा का रूप है।
आत्म-ज्ञान: “मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न का उत्तर खोजने से ही परमात्मा का अनुभव होता है। जब व्यक्ति जान लेता है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, तब मुक्ति मिलती है।
परमात्मा को पाना कठिन नहीं है, कठिनाई केवल हमारे मन में है। जब हम संसार की माया और भौतिक सुखों में उलझ जाते हैं, तब हमें अपनी वास्तविक शक्ति का एहसास नहीं होता। लेकिन जब हम अपने भीतर झाँकते हैं और मन को ईश्वर के प्रति समर्पित करते हैं, तब परमात्मा स्वयं को प्रकट करता है।

सत्य यही है: परमात्मा कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर ही है। हमें उसे खोजने की जरूरत नहीं, केवल महसूस करने की जरूरत है। जैसे सूरज हमेशा चमकता है, लेकिन बादल उसे ढक देते हैं, वैसे ही हमारे कर्म और वासनाएँ परमात्मा के अनुभव को ढक देती हैं। जब यह बादल हटते हैं, तब भीतर का प्रकाश स्वतः झलक उठता है।

निष्कर्ष: परमात्मा वह शक्ति है जो सबका आधार है। उसे पाने के लिए धन, जाति या किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। केवल एक सच्चे हृदय की जरूरत है, जो प्रेम, श्रद्धा और शांति से भरा हो। जब हम अपने जीवन में सत्य, करुणा और भक्ति को स्थान देते हैं, तब हम स्वयं परमात्मा के साक्षात स्वरूप बन जाते हैं।

प्रेरणादायक पंक्ति: “परमात्मा को पाने की सबसे बड़ी कुंजी है — स्वयं को जान लेना, क्योंकि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है।”




परमात्मा का अनुभव कैसे करें:
परमात्मा को समझना केवल ज्ञान से संभव नहीं है, उसे “अनुभव” करना पड़ता है। अनुभव तब होता है जब मन पूरी तरह शांत और अहंकार से मुक्त हो जाता है। जैसे ही मन की हलचल रुकती है, भीतर एक अनंत शांति का अनुभव होता है — वही परमात्मा की उपस्थिति है। यह स्थिति शब्दों से परे है, इसे केवल महसूस किया जा सकता है।

परमात्मा को अनुभव करने के लिए नियमित ध्यान, प्रार्थना और मौन का अभ्यास बहुत आवश्यक है। जब हम हर दिन कुछ समय अपने भीतर बैठकर मन को ईश्वर के नाम में लगाते हैं, तो धीरे-धीरे आत्मा शुद्ध होने लगती है। शुद्ध आत्मा में ही परमात्मा का प्रतिबिंब साफ दिखता है।

परमात्मा और मनुष्य का संबंध:
मनुष्य और परमात्मा के बीच का संबंध पिता-पुत्र के समान है। जैसे पुत्र अपने पिता से अलग नहीं होता, वैसे ही आत्मा परमात्मा से अलग नहीं है। अंतर केवल इतना है कि आत्मा सीमित रूप में है और परमात्मा असीम है। जब आत्मा अपनी सीमाओं को तोड़कर अनंत में विलीन होती है, तभी मुक्ति प्राप्त होती है। यही मोक्ष है – परमात्मा में लय।

महापुरुषों के विचार:
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है – “जो मुझमें लीन होकर भक्ति करता है, वही मुझे प्राप्त होता है।”
गौतम बुद्ध ने कहा – “सत्य तुम्हारे बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर है।”
और कबीरदास जी ने कहा – “मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।”
इन सभी महान आत्माओं का संदेश एक ही है — परमात्मा हमारे भीतर ही है, उसे पाने के लिए भीतर झाँको, बाहर नहीं।

आधुनिक जीवन में परमात्मा की भूमिका:
आज के समय में जब जीवन भागदौड़, तनाव और प्रतिस्पर्धा से भरा है, तब परमात्मा की भावना हमें संतुलन देती है। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि कोई सर्वोच्च शक्ति हर पल उसके साथ है, वह कभी अकेला या निराश नहीं होता। परमात्मा की स्मृति हमारे मन को स्थिर, हृदय को करुणामय और कर्म को शुभ बनाती है।

परमात्मा से जुड़ने के व्यावहारिक उपाय:

हर सुबह कुछ पल ध्यान करें और ईश्वर को याद करें।

प्रतिदिन एक अच्छा कार्य करें, जिससे किसी को खुशी मिले।

किसी से भी द्वेष न रखें; सबमें परमात्मा का अंश देखें।

ईमानदारी और सच्चाई से जीवन जिएँ।

हर कार्य से पहले मन में कहें – “यह कार्य तेरे लिए है, प्रभु।”

अंतिम संदेश:
जब व्यक्ति अपने भीतर के अंधकार को हटाकर प्रेम, शांति और सत्य को अपनाता है, तब उसका पूरा जीवन बदल जाता है। उस समय मनुष्य केवल शरीर नहीं रह जाता, वह ईश्वरीय चेतना का माध्यम बन जाता है। यही सच्चा परमात्मा का अनुभव है।

“परमात्मा कोई जगह नहीं, बल्कि एक अवस्था है — शुद्ध प्रेम, असीम शांति और पूर्ण आनंद की अवस्था।”

परमात्मा का अनुभव कब होता है:
जब मनुष्य सांसारिक इच्छाओं, मोह और अहंकार से मुक्त होता है, तभी भीतर का द्वार खुलता है। जब मन शांत होता है और विचार स्थिर हो जाते हैं, तब आत्मा का संबंध अपने स्रोत — परमात्मा — से जुड़ता है। यह जुड़ाव किसी शब्द, दर्शन या तर्क से नहीं, बल्कि अनुभूति से होता है। यह अनुभव इतना पवित्र और आनंदमय होता है कि शब्द उसमें सीमित पड़ जाते हैं। यही वह क्षण है जब मनुष्य समझता है — “मैं कुछ नहीं हूँ, सब वही है।”

परमात्मा की उपस्थिति के संकेत:
परमात्मा को पाने के बाद जीवन में कुछ विशेष परिवर्तन महसूस होते हैं —
मन में निरंतर शांति और आनंद की अनुभूति रहती है।
दूसरों के प्रति करुणा, प्रेम और सहनशीलता बढ़ जाती है।
भय, क्रोध और ईर्ष्या जैसे भाव स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाते हैं।
जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि सबके कल्याण के लिए बन जाता है।
हर स्थिति में आभार और संतोष का भाव रहता है।
ये ही वे संकेत हैं जो बताते हैं कि परमात्मा आपके भीतर प्रकट हो चुका है।



परमात्मा का साक्षात्कार हर किसी के लिए संभव है:
कई लोग सोचते हैं कि ईश्वर का अनुभव केवल साधु-संतों को होता है, पर यह सत्य नहीं है। परमात्मा का अनुभव हर व्यक्ति को हो सकता है — बस सच्ची इच्छा, श्रद्धा और धैर्य की आवश्यकता है। जैसे दीपक को जलाने के लिए बाती, तेल और अग्नि तीनों चाहिए, वैसे ही परमात्मा का अनुभव पाने के लिए भक्ति, ज्ञान और साधना — तीनों का मेल जरूरी है।

परमात्मा के साथ एकता का भाव:
जब आत्मा पूर्ण रूप से परमात्मा में लीन हो जाती है, तब “मैं” और “मेरा” का भाव समाप्त हो जाता है। उस अवस्था में न कोई भेद रहता है, न कोई अलगाव। वही अद्वैत स्थिति कहलाती है — जहाँ केवल “वह” ही है। यही जीवन का परम उद्देश्य है — परमात्मा के साथ एकत्व

जीवन में परमात्मा को जीवित रखना:
परमात्मा का अनुभव एक बार कर लेने से जीवन नहीं बदलता, बल्कि उस अनुभव को हर क्षण जीवित रखना आवश्यक है। इसका अर्थ है — हर कार्य में ईश्वर को याद रखना, हर व्यक्ति में उसकी झलक देखना और हर परिस्थिति को उसकी इच्छा मानकर स्वीकार करना। जब यह दृष्टि स्थायी हो जाती है, तब मनुष्य स्वयं ईश्वरीय प्रकाश का माध्यम बन जाता है।

अंतिम उपसंहार:
परमात्मा कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर ही है। उसे पाने के लिए किसी विशेष स्थान या रूप की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक सच्चे मन की आवश्यकता है। जब हम अपने भीतर के अंधकार को प्रेम, ज्ञान और भक्ति के प्रकाश से दूर करते हैं, तब वही प्रकाश परमात्मा का स्वरूप बनकर प्रकट होता है।
“परमात्मा को पाना यात्रा नहीं, जागरण है — जैसे अंधेरे में दीप जलाना, वैसे ही आत्मा में ईश्वर का प्रकाश जगाना।”

🌼 सत्य वचन (Satya Vachan):
 परमात्मा को पाना कोई बाहरी यात्रा नहीं, यह भीतर की जागृति है।
 जब मन शांत होता है और हृदय निर्मल होता है, तभी ईश्वर का प्रकाश भीतर प्रकट होता है।
परमात्मा न कहीं बाहर है, न किसी रूप में बंधा — वह तुम्हारे भीतर ही विराजमान है।
भक्ति, ज्ञान और कर्म – ये तीन ही परमात्मा तक पहुँचने की सच्ची सीढ़ियाँ हैं।
जो स्वयं को जान लेता है, वह परमात्मा को पा लेता है।
परमात्मा कोई स्थान नहीं, बल्कि एक अनुभूति है — शुद्ध प्रेम, असीम शांति और अनंत आनंद की अवस्था।
सच्ची भक्ति वहीं है जहाँ “मैं” मिट जाए और केवल “वह” रह जाए।

प्रेरक संदेश:
“जब तुम अपने भीतर के अंधकार को प्रेम और सत्य से मिटा देते हो, तब परमात्मा स्वयं प्रकाश बनकर प्रकट होता है।”


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